उच्चतम न्यायालय का बड़ा फैसला:SC/ST को प्रमोशन में आरक्षण दे सकेंगी राज्य सरकारें

दिनांक: September 26, 2018

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सरकारी नौकरी में पदोन्नति में एससी/एसटी को आरक्षण देने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने आज बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 2006 के एम. नागराज फैसले को बरकरार रखते हुए कहा है कि एम नागराज केस के फैसले पर दोबारा विचार नहीं किया जा सकता। संविधान पीठ के फैसले को पढ़ते हुए जस्टिस सीकरी ने कहा कि केंद्र सरकार को पदोन्नति में आरक्षण के पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने की आवश्यकता नहीं है। जबकि केंद्र सरकार कोर्ट को बताया था कि वो पहले पदोन्नति में आरक्षण के लिए आंकड़े जुटाएगी।

क्या है एम नागराज का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के एम. नागराज केस को लेकर फैसला दिया था कि 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा सरकारी नौकरियों की पदोन्नतियों में एससी-एसटी आरक्षण में लागू नहीं की जा सकती, जैसा अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर को लेकर पहले के दो फैसलों 1992 के इंद्रा साहनी और अन्य बनाम केंद्र सरकार (मंडल आयोग फैसला) और 2005 के ईवी चिन्नैय्या बनाम आंध्र प्रदेश के फैसले में कहा गया था।

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प्रमोशन में आरक्षण की मांग का इतिहास :

1. एससी/एसटी को सबसे पहले 1955 में पदोन्नति में आरक्षण दिया गया था।1955 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने संविधान में 77वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 में नई धारा 4/A को जोड़ा गया जिसके तहत एससी-एसटी प्रतिभागियों को वरियता देते हुए पदोन्नत किया जा सकता था।

2. 1992 में इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था। जिसके बाद सरकार को सरकारी नौकरियों में मिलने वाले पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगानी पड़ी।

3. इस नए कानून की संविधानिक वैधता को फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 2006 में एम नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में न्यायालय निर्देश दिए कि प्रमोशन देने के लिए संबंधित राज्य को अनुच्छेद 335 के तहत जायज कारण बताने होंगे मसलन पिछड़ापन,प्रतिनिधित्व की कमी और प्रतिभागी की प्रशासनिक योग्यता।

4. 2010 में राजस्थान हाईकोर्ट और 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की इसी निर्देश का पालन करते हुए पदोन्नति में आरक्षण के राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया था।


आरक्षण की अधिकतम सीमा

1. 1963 में बाला जी मामले के फैसले को दोहराते हुए इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता ।क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ख्याल रखना होगा तो दूसरी तरफ हमें सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना होगा।

2. लेकिन इसी मामले में जस्टिस जीवन रेड्डी ने ये साफ तौर पर कहा है कि विशेष परिस्थिति में स्पष्ट कारण दिखाकर सरकार 50 फीसदी की सीमा रेखा को भी लांघ सकती है।

3. हालांकि सामान्य तौर पर 50 फीसदी का नियम है कि इससे ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए।